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दर्जी नहीं सेना का सिपाही बनना चाहते थे वीर अब्दुल हमीद, जानें 7 रोचक बातें

भारतीय सेना में उन्होंने ऐसे वीरता भरे कारनामे लिखे जो आज हर भारतीय के दिलों-दिमाग में छाए हुए हैं। उन्होंने रण-भूमि में ऐसा इतिहास लिखा कि आने वाली सदियां शायद ही उन्हें भुला सके। 1965 के युद्ध में अब्दुल हमीद ने अपनी आरसीएल जीप से पाकिस्तान के अमेरिका से लिए हुए पैटन टैंकों को उड़ाकर दुनिया को हैरत में डाल दिया था। 7 सितंबर, 1965 की रात पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया, लेकिन मुट्ठी भर सैनिकों के साथ अग्रिम पंक्ति में मोर्चा संभाले अब्दुल हमीद दुश्मन के सामने फौलाद बनकर खड़े हो गए। अब्दुल हमीद बहुत साधारण परिवार से थे लेकिन जब उन्हें मौका मिला तो उन्होंने अपने  शौर्य, पराक्रम और वीरता की एक अद्भुत और असाधारण मिसाल कायम की। बहुत से लोग देश के इस जांबाज सिपाही के कारनामों से परिचित नहीं होंगे लेकिन आज हम आपको बता रहे हैं ‘परम वीर चक्र’ विजेता अब्दुल हमीद की जांबाजी की कहानी-





8 सितंबर 1965 की वो सुबह

वीर अब्दुल हमीद

8 सितंबर, 1965 की सुबह नौ बजे का समय था पंजाब के तरन-तारण जिले के खेमकरण में तैनात क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद चीमा गांव के बाहरी इलाके में कपास के खेतों के बीच गन माउनटेड जीप में ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठेकर एक कीचड़ वाली रोड से गुजर रहे थे। अचानक उन्हें दूर आते टैंकों की आवाज सुनाई दी। उन्हें दुश्मन की रणनीति समझने में देर न लगी। उन्होंने पाकिस्तानी टैंकों को अपनी रिकॉयलेस गन की रेंज में आने का इंतज़ार किया। उनके पास न तो सैनिक थे और न हीं टैंक और बड़े हथियार। हवलदार अब्दुल हमीद के पास केवल एक ‘गन माउनटेड जीप’ थी, लेकिन उनके पास कुछ मजबूत था तो सिर्फ हौसला।

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