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मिलिए उस मेजर से… जिसने रणक्षेत्र में पाकिस्तानी टैंक पर किया था भंगड़ा

ब्रिगेडियर कुलदीप चांदपुरी

‘हम युद्ध के लिए तैयार भी नहीं थे और 58 टैंकों व हथियारों से लैस दुश्मन लोंगेवाला की ओर बढ़ा चला आ रहा था। हमें या तो मैदान छोड़कर भाग जाना था या फिर दुश्मन से भिड़ जाना था। इनमें से किसी एक विकल्प को चुनना था….।’ जी हां, मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी चाहते तो अपनी टुकड़ी के साथ वहां से निकल जाते, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और जितने भी जवान उनके पास थे उन्हें लेकर दुश्मन सेना पर हमला बोल दिया। यदि वे ऐसा नहीं करते तो, शायद लोंगेवाला पर आज पाकिस्तान का कब्जा होता। मेजर चांदपुरी के नेतृत्व में ही भारत को लोंगेवाला की मशहूर लड़ाई में जीत हासिल हुई थी। 129 जवानों वाली पंजाब रेजिमेंट की कमान मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के पास थी।





भारतीय सेना के पास दुश्मन के मुकाबले बहुत कम जवान थे फिर भी डरकर पीछे नहीं हटी और दुश्मन पर हमला बोल दिया।

1971 में हुए भारत-पाकिस्तान में छिड़ी जंग के ये आखिरी दिन थे। 4 दिसंबर की शाम को मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी को सूचना मिली कि बड़ी संख्या में दुश्मन की फौज लोंगेवाला चौकी की तरफ बढ़ रही है। उस वक्त लोंगेवाला चेकपोस्ट चांदपुरी सहित सिर्फ 90 जवानों की निगरानी में थी। कंपनी के 29 जवान और लेफ्टिनेंट धर्मवीर इंटरनेशनल बॉर्डर की पेट्रोलिंग पर थे। ब्रिगेडियर ईएन रामदास ने कहा कि चौकी की सुरक्षा के लिए या तो यहीं रुकें या फिर पैदल ही वहां से रामगढ़ के लिए रवाना हो जाएं। अब फैसला मेजर चांदपुरी को करना था, वह चाहते तो बटालियन को लेकर अगली चौकी रामगढ़ रवाना हो सकते थे लेकिन उन्होंने वहीं रुककर पाकिस्तानी सेना से दो-दो हाथ करने की ठानी और जवानों को कार्रवाई करने का आदेश दिया। भारतीय जवानों का एक ही लक्ष्य था कि किसी तरह पाकिस्तानी सेना को आगे बढ़ने से रोका जाए।

‘मैं ठहरा पंजाबी का बच्चा कहां पीछे हटने वाला था’: चांदपुरी

मेजर चांदपुरी ने अपनी नेतृत्व क्षमता के दम पर ही इस क्षेत्र में दुश्मन का कब्जा होने से रोक दिया।

अंधेरा हो चला था… किसी तरह की सैन्य मदद मिल पाना उस समय संभव नहीं था। बिना देरी किए भारतीय जवान मुंहतोड़ जवाब देने की तैयारी में लग गए। कुछ ही देर बाद पाकिस्तानी टैंकों ने गोले बरसाते हुए लोंगेवाला चेकपोस्ट को घेर लिया। भारतीय सेना ने जीप पर लगी रिकॉयललैस राइफल और मोर्टार से फायरिंग शुरू कर दी। शुरुआत में भारतीय सेना द्वारा की गई ये जवाबी कार्रवाई इतनी दमदार थी कि पाकिस्तान सेना कुछ दूरी पर जाकर रुक गई। एक इंटरव्यू के दौरान चांदपुरी ने उस लड़ाई का जिक्र करते हुए कहा था कि मैं ठहरा पंजाबी का बेटा मैं कहां पीछे हटने वाला था। हम बिना किसी डर के दुश्मन सेना पर टूट पड़े।

रात भर बस एक ही आवाज गूंजती रही

ये टुकड़ी पंजाब रेजिमेंट की थी, जिसमें ज्यादातर जवान सिख और पंजाबी थे।

पाकिस्तान सेना में तकरीबन 2000 सैनिक थे और हमारे पास केवल 120 जवान। भारतीय सैनिकों के इरादे मजबूत थे, रात होते-होते तक इस छोटी टुकड़ी ने पाकिस्तान के 12 टैंक तबाह कर दिए थे। ‘जो बोले सो निहाल, सतश्री अकाल’ की आवाजें गूंज रही थीं। रात भर इसी तरह गोलाबारी जारी रही और इस टुकड़ी ने पाकिस्तानियों को 8 किलोमीटर तक खदेड़ दिया। पाकिस्तानी सेना के इरादे के मुताबिक वे हमारी चेकपोस्ट पर कब्जा कर रामगढ़ से होते हुए जैसलमेर तक जाना चाहते थे। पर हमारे इरादे भी फौलादी थे, जो दीवार बनकर उनके सामने खड़े थे। बस हमें आखिरी दम तक खड़े रहना था।

सुबह के इंतजार में काटी पूरी रात

आधुनिक हथियार नहीं थे फिर भी दुश्मन सेना को अपनी सीमा में पांव नहीं रखने दिया।

हवाई मदद मिलना संभव हुआ लेकिन तब तक रात हो गई थी। हंटर एयरक्राफ्ट रात के अंधेरे में हमला नहीं कर सकते थे। अब केवल सुबह का इंतजार था। अलसुबह ही 2 हंटर विमान लोंगेवाला की तरफ निकल पड़े। लोंगेवाला में अल्फा कंपनी और जैसलमेर में विंग कमांडर बावा ने सुबह के इंतजार में पूरी रात काटी। एक-एक पल पहाड़ जैसे बीता। उस वक्त रोशनी इतनी कम थी कि आसमान की ऊंचाई से जमीं का अंदाजा लगा पाना मुश्किल था। तब न तो नेविगेशन सिस्टम मॉडर्न था और न ही कोई लैंडमार्किंग थी। ऐसे में दोनों विमान जैसलमेर से लोंगेवाला तक जाने वाली सड़क के रास्ते को देखते हुए आगे बढ़े।

सात बजे कमांडर बावा ने भरी पहली उड़ान

मेजर कुलदीप सिंह बताते हैं कि जब मदद के तौर पर पहला विमान मंडराया तो जवानों की खुशी का ठिकाना नहीं था और उनका उत्साह देखने लायक था।

5 दिसंबर 1971 को सूरज की पहली किरण निकलते ही सुबह 7:03 बजे लोंगेवाला के रणक्षेत्र में एमएस बावा का विमान मंडराया। नीची उड़ान भरकर हंटर से पाकिस्तानी टी 59 टैंको को निशाना बनाना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में जैसलमेर एयरफोर्स स्टेशन से तीन और हंटर ने लोंगेवाला में टैंकों पर गोले दागने शुरू किए, पाकिस्तानी सेना उल्टे पांव भाग गई। पहले ही दिन कुल 18 टैंक नेस्तनाबूद हो गए। सूर्यास्त होने के बाद वायुसेना लौट गई, लेकिन अगले दिन 6 दिसंबर को हंटर ने फिर कहर बरपाना शुरू किया और पूरी ब्रिगेड व दो रेजीमेंट का सफाया कर दिया।

2 दिन में खाक हुए थे पाकिस्तान के 34 टैंक

लोंगेवाला में जीत के बाद उत्साह से खुशी मनाते और भंगड़ा करते पंजाब रेजिमेंट के जवान।

थार के रेगिस्तान में जैसलमेर जिले की लोंगेवाला चौकी पर मिली हार को पाक सेना शायद ही कभी भुला पाएगी। इस चौकी पर कब्जा जमाने के प्रयास में दो दिन में पाकिस्तान सेना को अपने 34 टैंक, पांच सौ वाहन और दो-सौ जवानों से हाथ धोना पड़ा। इसके बावजूद चौकी पर कब्जा नहीं हो सका। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया में यह पहला अवसर था जब किसी सेना ने एक रात में इतनी बड़ी संख्या में अपने टैंक गंवाए हों।

पाकिस्तान की सीमा में बैठकर हम खाना खा रहे थे

पाकिस्तानी सेना के इरादों को धराशायी करने के बाद अपनी जमीन पर धूप सेंकते भारतीय सैनिक।

पाकिस्तानी सेना इस इरादे से आगे बढ़ी थी कि वह भारतीय सेना को धराशायी कर देगी और उनका सुबह का नाश्ता लोंगेवाला में दोपहर का खाना रामगढ़ में और डिनर जोधपुर में होगा। लेकिन नजारा कुछ और ही था। सुबह तक हमें हंटर विमानों की मदद मिल गई थी जिनकी मदद से पाकिस्तानियों के परखच्चे उड़ा दिए। 14 दिसंबर 1971 को हम पाकिस्तान की हद में बैठे खाना खा रहे थे। 5 दिसंबर के दिन हम दुश्मन को खदेड़ते हुए पाकिस्तान के अंदर 8 किलोमीटर तक जा घुसे। 16 दिसंबर तक हमने वहीं पर डेरा जमाए रखा। वहीं खाना बनता और वहीं पर खाते। मुझे अच्छे से याद है 14 दिसंबर की सुबह भी हम पाकिस्तान की हद में बैठे नाश्ता कर रहे थे। 16 दिसंबर तक भारत ने जंग जीत ली। इसके बाद हम अपनी हद में वापस आ गए थे।

बन चुकी है सुपरहिट फिल्म बॉर्डर

हिंदी फिल्म ‘बॉर्डर’ का एक सीन, जिसमें सनी देओल ने मेजर कुलदीप सिंह की भूमिका निभाई है।

फिल्म ‘बॉर्डर’ तो आपको याद ही होगी। ये फिल्म 1971 के युद्ध पर ही आधारित थी और सनी देओल ने इस फिल्म में मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी की भूमिका निभाई थी। जेपी दत्ता द्वारा निर्देशित इस फिल्म में सनी देओल ने मेजर कुलदीप सिंह का किरदार निभाया था और कमांडर एमएस बावा का रोल सुनील शेट्टी ने प्ले किया था।

ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी 22 नवंबर 1940 को पंजाब के मांटगोमेरी में जन्मे थे जो अब पाकिस्तान में है। ब्रिगेडियर (तब मेजर) चांदपुरी अपनी जांबाजी और कुशल नेतृत्व के लिए जाने जाते हैं, वह भारतीय सेना के रिटायर्ड अफसर हैं और भारत सरकार ने उन्हें युद्ध के दौरान दिए गए योगदान के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया है।ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह ने 1962 में इंडियन आर्मी ज्वाइन की थी। उन्होंने पश्चिमी सेक्टर में हुए भारत पाक युद्ध में भी हिस्सा लिया। युद्ध के बाद वह एक वर्ष के लिए संयुक्त राष्ट्र के आपातकालीन बल गाजा में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। आज वह मेजर से ब्रिगेडियर हो गए हैं और सेना से रिटायर होकर अपने परिवार के साथ चंडीगढ़ में रहते हैं।

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