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एक निहत्था मेजर- जिसने पाकिस्तान की कैद से शेख परिवार को छुड़ाया

नई दिल्ली: 17 दिसंबर 1971 का वो दिन कर्नल अशोक तारा के साथ-साथ बांग्लादेश का सबसे ताकतवर शेख परिवार इसलिए याद रखता है क्योंकि उस वक्त उनकी जिंदगी दांव पर थी। अशोक तारा तब भारतीय सेना में मेजर थे लेकिन बिना हथियार ही शेख मुजीबुर्रहमान (तब पाकिस्तानी कैद में) के परिवार को उस मकान से निकालने जा पहुंचे जहां उन्हें नजरबंद रखा गया था। मकान के बाहर और छत पर स्वचालित हथियारों से लैस पाकिस्तानी फौजी तैनात थे। मकान के भीतर जाकर शेख परिवार को बाहर निकाल लाने की सोचना तो दूर मकान के पास तक फटकने की भी हिम्मत करना खुदकुशी करने जैसा था।





यहाँ यह बताना जरूरी है कि आज हम तारा साहब की जांबाजी की यह कहानी 46 साल बाद क्यों लेकर आये हैं। दरअसल शनिवार (8 अप्रैल) को 1971 युद्ध के शहीदों के सम्मान में नई दिल्ली में आयोजित “Sommanona Ceremony” में कर्नल तारा (रिटायर्ड) अपनी पत्नी के साथ मौजूद थे। इस कार्यक्रम में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने शहीदों के परिजनों को सम्मानित किया। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी मौजूद थे।

मेजर तारा को यहां अपना फर्ज तो याद था लेकिन साथ ही याद आ रही थी मीलों दूर दिल्ली में इंतजार कर रही पत्नी और चार महीने का बच्चा। दोनों की तस्वीर नजरों से हट नहीं रही थी। देश के लिए कुछ कर गुजरने के जज्बे वाले मेजर के लिए ये दूसरी जंग थी। इससे पहले उन्होंने गंगासागर युद्ध में हिस्सा लिया था। दो हफ्ते पहले ही युद्धक्षेत्र में उन्हें वीर चक्र मिला था। इस युद्ध से वह अपनी यूनिट 14 गार्ड्स की अल्फा कम्पनी की अगुआई कर रहे थे। उनका मातहत साथी लांस नायक अलबर्ट एक्का तब शहीद हुआ था जिसे सबसे बड़े सम्मान परमवीर चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया था। ये तमाम तस्वीरें तो बिल्कुल ही ताजा थीं।

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना और नरेंद्र मोदी शनिवार को नई दिल्ली में कर्नल अशोक तारा और उनकी पत्नी के साथ

मेजर तारा तीन सैनिकों को साथ लेकर चल दिए

मेजर अशोक तारा की यूनिट को ढाका हवाई अड्डे की चौकसी के लिए भेजा गया था। मेजर जनरल गोसाल्वेस का आदेश था कि हवाई अड्डे पर अधिकारी और वीआईपी पहुंचने वाले हैं। इसी बीच स्थानीय एक नेता बटालियन कमांडर कर्नल विजय कुमार चानना से मिलने आया और बोला कि मुजीब परिवार खतरे में है। डर है कि पाकिस्तानी सैनिक उनकी जान न ले लें। चानना ने मेजर तारा को बुलाया और उस शख्स के साथ घनमोंडी जाने को कहा। वहां से घनमोंडी का फासला तय करने में गाड़ी से 20 मिनट लगते थे।

मेजर तारा तीन सैनिकों को साथ लेकर चल दिए। धनमोंडी पहुंचते ही वह आदमी गाड़ी से उतर गया और उस मकान को दूर से ही दिखाकर खुद गायब हो गया। तभी एक मुक्ति योद्धा मेजर के वाहन के पास पहुंचा और बोला कि उस मकान में जिन पाकिस्तानी फौजियों ने शेख मुजीब के परिवार को बंधक बनाकर रखा है वो फौजी उनकी हत्या करने की धमकी दे चुके हैं।

तारा को एक शख्स मकान के पास तक ले गया…

मकान से कुछ फासले पर काफी भीड़ थी। मकान के बाहर जली हुई कार खड़ी थी। कार के भीतर गोलियों से छलनी एक शख्स की लाश पड़ी थी। तारा को एक शख्स मकान के पास तक ले गया वह शायद कोई पत्रकार था। उन्होंने मकान का एक नजर से जायजा लिया। छत पर रेत से भरी बोरियों का बंकर था जिसमें लाइट मशीन गन से लैस एक पाकिस्तानी फौजी तैनात था। ये फौजी चारों तरफ नजर रखे हुए था। उसका एक साथी जवान मकान के मेन गेट के पास उसी तरह के बंकर में पोजीशन लिए हुए था। हां, उनके और साथी मकान के भीतर हो सकते थे।

पूरे हालात भांपने के बाद मेजर तारा को ये तो समझ आ गया कि वह तीन सैनिकों की मदद से मकान से शेख परिवार को सुरक्षित बाहर नहीं निकाल सकते क्योंकि पाकिस्तानी फौजियों की पोजीशन मजबूत थी।

“एक रात पहले ही उन्होंने वहां भीड़ पर गोलियां दागी थीं जिसमें पांच लोग की जान गई थी।” एक महिला से ये सुनने के बाद मेजर तारा ने जिंदगी का जुआ खेलने का मन बना लिया। तीनों सैनिकों को पीछे रहने का आदेश देकर वह खुद मकान की तरफ बढ़े, वह भी निहत्थे। अपनी स्टेनगन उन्होंने जूनियर कमीशंड आफिसर को थमा दी।

फैमिली फोटो : उस समय बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना (सबसे दाहिने तरफ) की उम्र 24 वर्ष थी

उस ठंडी नाल का स्पर्श तारा आज भी महसूस करते हैं

सड़क पार करके जैसे ही मेजर तारा जली हुई कार के पास पहुंचे तो छत पर तैनात पाकिस्तानी फौजी चिल्लाया कि अब एक भी कदम आगे बढ़ाया तो गोली मार दी जाएगी। मेजर तारा ने उसे पंजाबी मिश्रित हिंदी में जवाब दिया और कहा मैं भारतीय फौज का अफसर हूं और तुम्हारे सामने बिना हथियार के खड़ा हूं। अगर मैं इस तरह तुम्हारे सामने खड़ा हूं तो समझ लो कि तुम्हारी फौज ने सरेंडर कर दिया है। तुम हथियार डाल दो। तुम अपने अफसर से पूछ लो। ये कहते-कहते मेजर तारा धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे तभी संतरी की ड्यूटी कर रहे पाकिस्तानी फौजी ने अपनी बंदूक की नाल उनके सीने पर सटा दी। कड़ाके की इस ठंड में, और उस ठंडी नाल का स्पर्श तारा आज भी महसूस करते हैं।

शेख मुजीब के परिवार को छोड़ दो वरना खुद मारे जाओगे!

तभी पाकिस्तानी सैनिक बोला कि उसका अपने अफसर से वायरलेस पर संपर्क नहीं हो रहा और वे सरेंडर नहीं करेंगे। तभी वहां आसमान में भारतीय सेना के हेलिकाप्टर उड़ते नजर आए। मेजर तारा ने पाकिस्तानियों को कहा कि इन हेलिकाप्टरों को देखो-भारतीय फौज आ चुकी है। तुम सरेंडर कर दो और शेख मुजीब के परिवार को छोड़ दो वरना खुद मारे जाओगे। मेजर तारा के इस वादे पर वे फौजी बाहर आने को तैयार हुए कि उन्हें वहां से सुरक्षित जाने दिया जाएगा। मेजर तारा ने उन्हें समझाया कि मेरी तरह तुम्हारा परिवार भी तुम्हारा इंतजार कर रहा है। भलाई इसी में है कि सरंडर करो।

…और देखा कि शेख परिवार जमीन पर सोया हुआ है!

इसके बाद वहां तीन फौजियों ने सरेंडर किया। उन्हें साधारण कपड़े दिए गए। वो फौजी वर्दी वहीं छोड़कर सादे लिबास में निकले। अगर ऐसा न करते तो भीड़ उन्हें मार डालती। तारा जब मकान के भीतर पहुंचे तो देखा वहां नाममात्र का फर्नीचर था। खाने के सामान के नाम पर कुछ बिस्किट रखे थे। शेख परिवार जमीन पर सोया हुआ था। तब शेख हसीना 24 साल की थीं और उनकी गोद में बच्चा था। लेकिन मेजर तारा को शेख मुजीबर्रहमान की पत्नी बेगम फजीलतुनिसा ने तब बेटा कहकर पुकारा और गले लगा लिया।

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