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Army Day Special: सेना के लिए है देश सबसे पहले

भारतीय सेना
भारतीय जवान (फाइल फोटो )

अखबारों की एक बानगी-





‘पिछले 13 वर्षों में, ‘सेना ने हर तीसरे दिन ड्यूटी पर अपना एक सैनिक गंवाया’- द इकोनोमिक टाइम्स, 16 जनवरी, 2018.

‘बिना युद्ध किए भारत प्रति वर्ष लगभग 1,600 सैनिकों को खो देता है’ (उपरोक्त उल्लेखित रिकॉर्ड्स के अतिरिक्त)- द इकोनोमिक टाइम्स, 03 दिसंबर, 2017.

1984 से अभी तक लगभग 900 सैनिक सियाचीन, जोकि पाकिस्तान-चीन की 76 किमी लंबी सीमा में विश्व का सबसे बड़ा युद्धक्षेत्र है, में अपनी जान गवां चुके हैं। यह संख्या भारतीय सेना में बड़ी तादाद में विकलांग हो चुके जवानों के अतिरिक्त है, जो रीढ़ की हड्डी में चोट के बाद पैराप्लेज्क्सि (नीचे के दोनों अंग लकवाग्रस्त और मूत्राशय और आंत्र नियंत्रण) और टेट्राप्लेजिक्स (बिना मूत्राशय और आंत्र नियंत्रण के सभी चार अंग लकवाग्रस्त) के शिकार हो चुके हैं। यह किसी जीवित व्यक्ति के लिए शारीरिक विकलांगता का सबसे गंभीर रूप है। सेना पैराप्लेज्क्सि पुनर्वास केंद्र में 83 सिंगल बेड और 26 विवाहित क्वार्टर हैं जिससे वह कुल 109 बेड वाला केंद्र है। इसकी बदौलत वह भारत में अपनी तरह का सबसे बड़ा और दक्षिण पूर्व एशिया में सबसे बड़े केंद्रों में से एक पैराप्लेज्क्सि पुनर्वास केंद्र बन गया है, लेकिन ‘हम युद्धरत नहीं हैं।’

सैनिक भी उसी प्रकार के भारतवासी हैं जो शांति एवं अमन चैन सुनिश्चित करने के लिए सबसे पहले देश के लोकाचार पर कार्य करते हैं और राष्ट्र के विकास के लिए अनुकूल माहौल का निर्माण करते हैं।

29 राज्यों के निवासी ये भारतीय सशस्त्र बल सैनिक 22 विभिन्न भाषाएं और अनगिनत स्थानीय जुबान बोलते हैं, सबसे पहले देश की भावना के साथ बड़े धर्मों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सैनिक निष्ठा के साथ कर्तव्य का निर्वहन करते हैं, साहस के साथ नेतृत्व करते हैं और सबसे पहले देश की भावना के साथ और जाति, धर्म या संप्रदाय के आधार पर बिना किसी भी प्रकार का भेदभाव किए नागरिकों के प्रति प्रेम की भावना के साथ कार्य करते हैं। उसके कंधों पर असीमित जिम्मेदारी होती है, हमेशा खतरों से खेलता है और इस बात से पूरी तरह वाकिफ होता है कि किसी भी क्षण उसकी जान जा सकती है। बावजूद इसके सभी तरह की आपातकालीन स्थितियों में या राष्ट्रीय आपदाओं में उसने पहाड़ों में फंसे, भीषण बाढ़ से जूझ रहे हजारों लोगों की जानें बचाई हैं। वह आतंकवादियों का मुकाबला करता है और कई बार पूरी तरह जानते हुए कि उसकी जान भी जा सकती है, उसके अवचेतन में स्वत: ही आचार संहिता की दुरुह और उदात्त भावना सबसे पहले देश के नैतिक दबाव और जिम्मेदारी के साथ चली आती है।

भारतीय सशस्त्र बल का अभिवादन शब्द ‘जय हिन्द‘ है जो बिना किसी जाति, धर्म, प्रजाति या विशिष्ट समुदाय के संपूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करने का एक विवेकशील अभिवादन है। यह राष्ट्र प्रथम के साथ एकात्मकता की ताकत का प्रतीक है और अमनपसंद लोग इस पर ‘भारत दीर्घजीवी हो‘ के रूप में विचार कर सकते हैं।

हमारा देश प्राचीन सभ्यता और विविधता का एक महान देश है। अतीत, वर्तमान एवं भविष्य के मोतियों को देशभक्ति की एक मजबूत भावना के साथ एक साथ गुंथा जा सकता है और यही समावेशी विकास की जिम्मेदारी की वास्तविक भावना को आत्मसात करता है। और जब यह वास्तविकता के धरातल पर आता है तो हमें हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि देश का मुद्वा सदा और हर समय सबसे अग्रणी और प्रमुख है। सामाजिक समावेश देश के सामंजस्यपूर्ण विकास के लिए एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि कोई भी देश सफल हो, इसके लिए जरुरी है कि सबसे पहले देश की भावना के साथ राष्ट्रीय एकता पर मजबूत बाध्यकारी बल हो। सैनिक की तरह नागरिक भी ग्रामीण भारत के ही वासी होते हैं जो युद्ध और शांति दोनों ही आपातकालीन स्थितियों में निस्वार्थ सेवा के दूत बन कर राष्ट्र के सम्मान की रक्षा करने के लिए सर्वोच्च कुर्बानी देते हैं। प्रत्येक नागरिक, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, प्रजाति या व्यवसाय से जुड़ा हो, राष्ट्र प्रथम के प्रति वचनबद्धता के साथ एक सैनिक है और अपने प्रति जताए गए विश्वास पर खरा उतरता है, जो अपने कार्यों को न्यायसंगत सिद्ध करता है और ‘रक्त एवं सम्मान‘ पर केंद्रित अंतर्निहित नैतिक एवं मूल्य प्रणाली के साथ आचार संबंधी नेतृत्व का अनुकरण करता है और इस प्रकार सैनिक, जो हमारे देश को सुरक्षित रखता है, हमारी संप्रभुता, स्वतंत्रता, शांति एवं अमन चैन सुनिश्चित करता है, को सैल्यूट के साथ राष्ट्र निर्माण में योगदान देता है।

‘सेल्यूट द सोल्जर’– यह नाम है एक पुस्तिका (बुकलेट) का, लेकिन यह सिर्फ एक पुस्तिका नहीं है अभियान है। यह सेना के अनुभवी और वरिष्ठ अधिकारी का अनूठा प्रयास है-

https://drive.google.com/file/d/1BpF0vInrFzBg_mpT0uH6llRXZPoZP8d7/view

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