Air Force

समर नीति: लड़ाकू विमान राफेल से नये युग की शुरुआत

राजनाथ सिंह

फ्रांस में बन रहे 36 राफेल लड़ाकू विमानों में से पहले को वायुसेना दिवस के मौके पर केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पेरिस जा कर खुद ग्रहण कर राफेल विमानें की अहमियत सामरिक जगत को रेखांकित की है। राफेल  विमानों के पूरे दो स्क्वाड्न (36 विमान) का उत्पादन साल 2022 के मध्य तक ही पूरा हो पाएगा इसलिये तब तक भारतीय वायुसेना को अपने मौजूदा लड़ाकू विमानों पर ही निर्भर रहना होगा। लेकिन इन विमानों के भारतीय वायुसेना में शामिल होने के बाद भारतीय वायुसेना की हमला औऱ संहारक क्षमता में भारी इजाफा होगा। लेकिन भारतीय रणनीतिकारों की चिंताएं केवल राफेल विमानों के शामिल होने से ही दूर नहीं हो पाएगी। राफेल विमान कुछ हद तक भारतीय वायुसेना की मौजूदा संहारक  क्षमता की भरपाई ही करेंगे।





 भारतीय वायुसेना की सबसे बड़ी चिंता है लड़ाकू विमानों के घटते स्क्वाड्रनों  की तेजी से गिरती संख्या। वायुसेना मुख्यालय ने कई साल पहले यह तय किया था कि दुश्मन का प्रभावी मुकाबला करने के लिये उसके पास लड़ाकू विमानों के 42 स्क्वाड्रन होने चाहिये लेकिन इनकी संख्या घट कर 30 के चिंताजनक स्तर पर आ गई है। एक ओर जब कि पाकिस्तान की वायुसेना में लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़कर 28 हो गई है वहीं केवल तीस स्क्वाड्रनों से भारतीय वायुसेना दुश्मन पर सक्षम तरीके से हावी नहीं हो सकती।

भारतीय वायुसेना में नये ल़ड़ाकू विमानों की क्षमता बढ़ाने की जो मौजूदा योजना है उनसे यह भरोसा नहीं पैदा होता कि अगले दशक के अंत तक वायुसेना के पास करीब 40 स्क्वाड्रन विमान हो जाएंगे। वायुसेना के लिये फिलहाल 83 स्वदेशी लाइट कम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस बनाए जा रहे हैं औऱ इसके अलावा 114 लड़ाकू विमानों के टेंडर पर नये सिरे से काम हो रहा है लेकिन इन्हें वास्तविक तौर पर वायुसेना में सक्रिय तौर पर शामिल करने में कितना वक्त लगेगा कहा नहीं जा सकता। खुद वायुसैनिक अधिकारियों को अनुमान नहीं है कि 114 नये लड़ाकू विमानों को शामिल करने में कितने साल लग जाएंगे।

भारतीय वायुसेना के लिये जो विदेशी लड़ाकू विमान देश में बनाए जा रहे हैं वे रूसी सुखोई-30 एमकेआई हैं जिनका कुल 272 का उत्पादन हिंदुस्तान एरोनाटिक्स लि. में हो रहा है। HAL ने अब तक 242 सुखोई-30 एमकेआई भारतीय वायुसेना को सौंप दिये हैं लेकिन जिस गति से इनका भारतीय वायुसेना में समावेश हो रहा है उसकी तुलना में रिटायर करने वाले विमानों की दर काफी अधिक है। इसलिये भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रनों की क्षमता बढ़ने के बदले घटती ही जा रही है।

फिलहाल जिन 114 विमानों का टेंडर निकला है उनका निर्माण ‘मेक इन इंडिया’ योजना के तहत भारत में ही किसी विदेशी कम्पनी और भारतीय कम्पनी की सामरिक साझेदारी के तहत होगा। लेकिन चूंकि अब तक यह तय नहीं हुआ है कि किस विदेशी कम्पनी को भारतीय कम्पनी के साथ मिल कर साझेदारी करने का मोका मिलेगा। यह तय होने में कम से कम दो साल का वक्त लगेगा और इसके बाद  भारत  में लड़ाकू विमान बनाने की सुविधा स्थापित करने में भी कितना वक्त लगेगा कहना मुश्किल है। इस चक्कर में भारतीय वायुसेना के लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या घटती जाएगी।

इतने कम लड़ाकू विमानों से भारतीय वायुसेना  उत्तर में चीन और पश्चिम में पाकिस्तान की चुनौतियों का एक साथ मुकाबाला कैसे करेगी इस बात को लेकर भारतीय रणनीतिकारों की चिंताएं बढ़ गई हैं । जिस तरह से भारत के इर्द-गिर्द सुरक्षा माहौल निरंतर बिगड़ता जा रहा है उसके मद्देनजर भारतीय रक्षा कर्णधारों को तुरंत  आपात योजना पर काम करना होगा।

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