Air Force

MI-17 : भारत लगाएगा अपना इलेक्ट्रॉनिक ब्लैक बॉक्स

ब्लैक बॉक्स कॉकपिट डेटा रिकॉर्ड

चंडीगढ़। भारतीय वायुसेना के रूस निर्मित एमआई-17 (MI-17) हेलिकॉप्टरों को मौजूदा पुरानी प्रौद्योगिकी के स्थान पर जल्द ही स्वदेशी तौर पर विकसित इलेक्ट्रॉनिक ब्लैक बॉक्स से लैस किया जाएगा। इन्हें हेलिकॉप्टरों के नीचे स्थित  बीकन (यूएलबी) के साथ फिट किया जाएगा।





गहरे नारंगी रंग का ब्लैक बॉक्स उड़ान डेटा रिकॉर्ड (एफडीआर) और कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (सीवीआर) के लिए इस्तेमाल होने वाला एक सामान्य शब्द है, जो एक विमान के उड़ान पैरामीटर को रिकॉर्ड करता है। एयर क्रू और रेडियो ट्रांसमीशन, पायलटों और ग्राउंड कंट्रोल और रेडियो प्रसारण के बीच संवाद स्थापित करता है। बता दें कि भारत रशियन हेलीकॉप्टर्स के प्रमुख बाजारों में से एक है और दक्षिण-पूर्व एशिया में रूसी हेलिकॉप्टर्स का सबसे बड़ा संचालक है।

एमआई-17

रूस निर्मित एमआई-17 (MI-17) हेलिकॉप्टर

स्वदेशी तरीके से बदलने की तैयारी

वर्तमान में, एमआई -17 एसएआरपीपी -12 एफडीआर और एमएस -61 सीवीआर से लैस है, जहां लैब में विकसित एक फोटोग्राफिक फिल्म पर तरंगों के रूप में डेटा प्राप्त किया जाता है। भारतीय वायुसेना के एक अधिकारी के मुताबिक, वायुसेना इन सभी को स्ट्रोंग मैमोरी वाले गैजेट्स के साथ बदलने पर विचार कर रही है, जहां डेटा डाउनलोड, संसाधित और डिजिटल रूप से अधिक सुविधाजनक और कुशल तरीके से जमा किया जा सकता है।

सूत्रों के मुताबिक, चंडीगढ़ में 3 नंबर बेस रिपेयर डिपो पर दो हेलीकाप्टरों पर इस नए उपकरण को शुरू किया जाएगा, नए उपकरणों के प्रदर्शन के मूल्यांकन और प्रमाणन को सैन्य उपयुक्तता के लिए सह-स्थित क्षेत्रीय केंद्र द्वारा संचालित किया जाएगा।

इस धातु से निर्मित होता है ब्लैक बॉक्स

ब्लैक बॉक्स बहुत ही मजबूत मानी जाने वाली धातु टाइटेनियम का बना होता है और इसी धातु से बने एक बॉक्स में बंद होता है, जिससे इसके गिरने या समुद्र में डूब जाने पर इसे कोई नुकसान न हो। इस पर आग व पानी का कोई असर नहीं होता और 20,000 फीट की दूरी से इसका पता लगाया जा सकता है। ब्लैक बॉक्स की बैटरी 30 दिनों तक चलती है।

आग और पानी का नहीं होता असर

ब्लैक बॉक्स को कई टेस्ट से गुजारा जाता है। ब्लैक बॉक्स रिकॉर्डर ‘एल-3 एफए 2100’ 1110 डिग्री सेल्सियस फायर में कई घंटे और 260 डिग्री सेल्सियस हीट में 10 घंटे तक रह सकता है। यह माइनस 55 से प्लस 70 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी काम कर सकता है। ब्लैक बॉक्स दुर्घटना विश्लेषण के लिए काफी महत्वपूर्ण है और इसका उपयोग प्रदर्शन मूल्यांकन और प्रशिक्षण के लिए भी किया जाता है।

ऐसे हुई ब्लैक बॉक्स की खोज, ‘रेड एग’ के नाम से पुकारा जाता था

डेविड वारेन

ब्लैक बॉक्स के आविष्कारक डेविड वारेन

वर्ष 1953-54 में हवाई हादसों की बढ़ती संख्या को देखते हुए विमान में एक ऐसा उपकरण लगाए जाने की बात की गई, जो विमान में दुर्घटनाग्रस्त होने या हादसे की जानकारी ठीक से दे सके। आॅस्ट्रेलिया के साइंटिस्ट डेविड वारेन ने ब्लैक बॉक्स का आविष्कार किया था। शुरूआत में इसे लाल रंग के कारण ‘रेड एग’ के नाम से पुकारा जाता था। बाद में इस बॉक्स की भीतरी दीवार को काला कर दिया गया, जिससे इसका नाम ब्लैक बॉक्स पड़ गया।

ब्लैक बॉक्स उड़ान डेटा रिकॉर्ड

वर्ष 1960 में आॅस्ट्रेलिया पहला ऐसा देश था, जिसने विमानों में ब्लैक बॉक्स लगाना अनिवार्य कर दिया था। भारत में नागर विमानन महानिदेशालय के नियमों के अनुसार, 01 जनवरी, 2005 से सभी विमानों और हेलिकॉप्टरों में सीवीआर और एफडीआर लगाए जाने को अनिवार्य कर दिया गया। विमान का ब्लैक बॉक्स मिलने के बाद जांचकर्ता उसे लैब में ले जाते हैं, जहां इसमें रिकॉर्ड डाटा के जरिए विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के कारणों के बारे में पता लगाया जाता है।

छठे दिन मिला सुखोई का ब्लैक बॉक्स, पायलटों का सुराग नहीं

टॉवेड पिंगर लोकेटर 25

इसमें हाइपर सेंसिटिव हाइड्रोफोन लगा होता है, जो सिग्नल्स को 6000 मीटर की गहराई तक पता लगा सकता है।

ब्लूफिन 21

यदि विमान समुद्र में दुर्घटनाग्रस्त हो जाए, तो ब्लैक बॉक्स की खोज के लिए ब्लूफिन 21 का इस्तेमाल किया जाता है। इसे अंडर वाटर ड्रोन भी कहा जाता है। यह 4500 मीटर की गहराई तक खोज कर सकती है।

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