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सैन्य अफसरों को रिटायरमेंट के बाद भी रैंक जाहिर करने की अनुमति क्यों ?

सैन्य अफसर
सैन्य ऑफिसर (सौजन्य- गूगल)

नई दिल्ली। संविधान का अनुच्छेद 18 रक्षा सेवा अफसरों को रिटायरमेंट के बाद भी अपनी रैंक को नाम के साथ इस्तेमाल करने की अनुमति देता है। यह कहता है कि ‘रैंक कभी रिटायर नहीं होता, अधिकारी होता है।’ इसके लिए पृष्ठभूमि और संदर्भ को समझने की आवश्यकता है कि क्यों हमारे संविधान निर्माताओं ने अधिकारियों को यह विशेषाधिकार दिया गया है जो किसी भी लोकतांत्रिक देश में समानता के दर्शन के खिलाफ लगता है।





रक्षा सेवा अधिकारियों के कर्तव्यों और जिम्मेदारियों की प्रकृति अन्य कामों से बहुत अलग हैं फिर चाहे वह सरकारी काम हो या निजी क्षेत्र का कोई जिम्मेदारी वाला काम।

रक्षा सेवा अधिकारियों को भारत के राष्ट्रपति कमीशन करते हैं। इसका मतलब यह है कि एक कमीशन अधिकारी ही किसी उच्च अधिकारी के पद को धारण करता है। उस अधिकारी को वह अधिकार संप्रभु सत्ता से सीधे मिलते हैं और भारत के राष्ट्रपति द्वारा उसे एक अधिकारी का रैंक दिया जाता है। अन्य सरकारी कर्मचारियों के विपरीत, एक कमीशंड अधिकारी सिविल और न्यायिक अधिकार का प्रयोग करता है और अपने सैनिकों के लिए आदेश जारी करता है। इसके कई निहितार्थ हैं। ऑपरेशन से जुड़े कार्यों के अलावा, एक रक्षा अधिकारी अपने अधीनस्थ काम करने वाले सैनिकों के जीवन के लिए उत्तरादायी भी होता है। उस अधिकारी की टीम के प्रति जिम्मेदारी वैसी ही होती है, जैसे परिवार के सदस्यों के प्रति परिवार के मुखिया की होती है। इसके लिए एक बेहतर रूपक यह होगा कि एक पितृ/मातृ प्रधान कबीले की रक्षा के लिए जिस तरह उसका मुखिया उत्तरदायी होता है।

दिलचस्प बात यह है कि केवल एक कमीशन अधिकारी ही किसी तरह के कमांडिंग ऑफिसर के रूप में कार्य कर सकता है। यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि कमीशन होने पर एक अधिकारी शपथ लेता है – जो सिविल सर्वेंट से बहुत अलग है। एक सिविल कर्मचारी संविधान के प्रति कर्तव्यनिष्ठ होने की शपथ लेता है जबकि एक कमीशन अधिकारी देश की सेवा करने और जमीन, समुद्र या कहीं भी अपनी जान की परवाह किए बिना जाने की शपथ लेता है।

निहितार्थ क्या हैं?

सिविल में काम करने वाला कर्मचारी अपने तबादले को चुनौती दे सकता है। आदेश ठुकरा सकता है। लेकिन रक्षा अधिकारी ऐसा नहीं कर सकता। वह यह नहीं कह सकता है कि – ‘मैं विरोध में इस्तीफा दे रहा हूं’ और न ही वह स्थानांतरण से बचने के लिए लंबी छुट्टी ले सकता है।

यदि उसे दुनिया के किसी भी हिस्से में सेवा करने का आदेश दिया जाता है तो उसे जाना होगा इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसकी सेवा का स्थान भारत, अफ्रीका या अंटार्कटिका में है।

एक अधिकारी अपने स्तर पर छुट्टी नहीं ले सकता। वह बीमार होने पर छुट्टी नहीं ले सकता, जैसा कि सिविल अधिकारी लेते हैं।  मिलिट्री अस्पताल के डॉक्टर जांच करेंगे और निर्णय लेंगे कि क्या उन्हें अस्पताल में भर्ती होना आवश्यक है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि एक अधिकारी का ‘जीवन’ राष्ट्र की संपत्ति है।

सिविल अधिकारियों और कमीशन अधिकारियों की शपथ की तुलना दिलचस्प होगीः 

सिविल सर्वेंट की शपथ: ‘मैं (नाम) कसम खाता हूं/ पूरी ईमानदारी से कहता हूं कि मैं भारत के लिए और भारत के संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा रखूंगा और मैं भारत की संप्रभुता और अखंडता को बनाए रखूंगा। मैं अपने कार्यालय के कर्तव्यों को पूरी निष्ठा, ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ निभाऊंगा।’

एक कमीशन हो चुके अधिकारी की शपथ: ‘मैं (नाम) इस बात की कसम खाता हूं कि मैं भारत के प्रति सच्चा विश्वास और निष्ठा धारण करूंगा, जैसा कि कानून द्वारा स्थापित है और मैं ईमानदारी से और पूरे विश्वास के साथ कर्तव्य निभाऊंगा, भारतीय संघ की नियमित सेना में सेवा करूंगा और जहां भी आदेश होगा वहां जाऊंगा, फिर चाहे वह जमीन पर हो, समुद्र में हो या वायु मार्ग से जाना पड़े। मैं भारत संघ के राष्ट्रपति और मेरे वरिष्ठ अधिकारी के सभी आदेशों का पालन करूंगा , फिर चाहे उसमें मेरी जान की बाजी क्यों न लगानी पड़े।’

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जब एक अधिकारी कमीशन पाता है तो वह अपने जीवन को ब्लैंक चेक में लिखकर राष्ट्र को सौंप देता है और सरकार अपनी इच्छा के अनुसार इसे भुना सकती है।

 

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