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एक क्रांतिकारी जिसने कर दिया था अंग्रेजों की नाक में दम, जानें 7 खास बातें

1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों के अत्याचार बेहद बढ़ गए थे। किसानों, मजदूरों की हालत दिन प्रति दिन दयनीय होती जा रही थी। अंग्रेजों के जुल्मों के खिलाफ प्रतिरोध की कोई सशक्त आवाज नहीं उठ पा रही थी। ऐसे दौर में बलबंत वासुदेव फड़के उम्मीद की किरण बनकर उभरे। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए उन्होंने सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाया। उन्होंने युवाओं को इकट्ठा किया और अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। वासुदेव बलवंत फड़के की छापामार शैली ने अंग्रेजों की नाकों में दम कर दिया था । अंग्रेजों को मजबूर होकर वासुदेव बलवंत फड़के पर इनाम की घोषणा करनी पड़ी। आज हम आपको बता रहे हैं जांबाज क्रांतिकारी वासुदेव बलवंत फड़के की वीरता की कहानी :-





मां की मौत ने बदला जीवन

वासुदेव बलवंत फड़के का जन्म रायगढ़ (महाराष्ट्र) के एक गांव में हुआ था। उनके जीवन में उनकी मां और उनके गुरु का अहम् रोल था। शुरू से ही वासुदेव को कुश्ती और घुड़सवारी का शौक था। पुणे के मिलिट्री एकाउंट्स डिपार्टमेंट में उन्होंने क्लर्क की नौकरी कर ली। एक बार उनकी मां बहुत बीमार थीं। मां अपने बेटे से मिलना चाहती थीं। वासुदेव बलवंत फड़के ने छुट्टी मांगी लेकिन अंग्रेज अफसर ने छुट्टी देने से मना कर दिया। वह बिना छुट्टी के घर चले गए लेकिन अंतिम वक्त में भी वह अपनी मां से ना मिल सके। इस घटना ने उन्हें एहसास कराया कि गुलामी क्या होती है। जिस मां ने पाला-पोसा उसी मां से नौकरी की वजह से मिल नहीं पाए। उन्हें लगा कि न जाने कितनी मांएं हैं जो भारत मां की गुलामी के चलते अपने बेटों से नहीं मिल पाती होंगी। 15 साल की सरकारी नौकरी को लात मारकर उन्होंने भारत मां को अंग्रेजी गुलामी से मुक्त करने का प्रण ले लिया।

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