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पहले रहे शासकों के ‘गुलाम’ फिर 84 वर्ष तक दिल्ली पर की हुकूमत, गुलाम वंश की 8 खास बातें

यह बेहद हैरान कर देने वाली बात है कि जिन गुलामों को किसी समय सब्जी-भाजी की तरह खरीदा और बेचा जाता था। उन्होंने तकरीबन 84 वर्ष तक दिल्ली की सल्तनत संभाली। भारत की सरजमीं पर यूं तो तमाम मुस्लिम शासकों ने राज किया। जिसमें सत्ता हासिल करने के लिए भयंकर युद्ध भी हुए। यह सुनना काफी हैरानीभरा लगता है कि किसी बादशाह के बाद उस गद्दी पर उसके गुलाम का अधिकार हो गया हो। इतना ही नहीं बल्कि उसके बाद उसके वंशजों ने वर्षों तक उस गद्दी को संभाला हो लेकिन गुलाम वंश इसका प्रत्यक्ष प्रमाण साबित हुआ। तो आइए जानते हैं कि किसने इस वंश की स्थापना की और कैसा रहा इनका शासक–





कौन थे ममलुक या गुलाम?

गुलाम वंश के शासनकाल में कई एतिहासिक धरोहरों का निर्माण हुआ, जिस कारण इस वंश और इसके शासकों को आज भी याद किया जाता है। ममलुक शब्द अरबी भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है गुलाम। इसे दास वंश या गुलाम वंश भी कहा जाता है। ये गुलाम घरों में काम करने वाले गुलाम नहीं थे, बल्कि इन्हें शासकों द्वारा उचित मूल्य देकर खरीदा जाता था। ये सेना में सिपाही के रूप में काम करते थे। 9वीं सदी में मुस्लिम शासकों द्वारा इन गुलामों का इस्तेमाल करना आम हो गया था। इस कारण सेना में इनकी संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई और नतीजा यह हुआ कि ये स्थानीय बादशाह के लिए परेशानी का सबब बन गए। इन्हीं गुलामों में से कुछ ने मुस्लिम राज्यों की राजनीतिक गतिविधियों पर अपना कब्जा जमा लिया और वहां के बादशाह तक बन गए।

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