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समर नीति: इसलिए हैं भारत, जापान और अमेरिका एक साथ

भारत, जापान और अमेरिका का तिरंगा

हिंद प्रशांत के इलाके में चीन की दादागिरी के खिलाफ बड़ी ताकतों ने साझी रणनीति बनाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। गत 4 अप्रैल को नई दिल्ली में भारत, जापान और अमेरिका के आला अधिकारियों की त्रिपक्षीय बैठक संकेत देती है कि दक्षिण चीन सागर में चीन के विस्तारवादी कदमों का प्रतिवाद करने के लिए जमीनी स्तर पर व्यावहारिक कदम उठाए जाने पर विचार शुरू हो गया है। हिंद महासागर के तटीय देश होने के नाते जापान और अमेरिका भारत से उम्मीद कर रहे हैं कि इस इलाके में अपना सामरिक वजन बढ़ाए और चीन की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिये तैयार रहे। लेकिन प्रशांत सागर के दक्षिण चीन सागर में चीन जिस तरह आक्रामक तरीके से द्वीपों पर अपना प्रभुत्व जमाता जा रहा है उसे सीधी चुनौती अमेरिका या जापान देने की हिम्मत नहीं कर रहे हैं।





दक्षिण चीन सागर के इलाके में भारत की कोई सैन्य मौजूदगी नहीं है और भारत वहां अपना नौसैनिक बेड़़ा हमेशा के लिये तैनात भी नहीं रख सकता। इतना जरूर है कि भारत के युद्धपोत दक्षिण चीन सागर के इलाके से हो कर वियतनाम,  दक्षिण कोरिया,  जापान,  फिलीपींस आदि देशों का दौरा करते हैं और इस तरह भारत इस इलाके से होकर स्वच्छंद तौर पर विचरण करने का अपना अधिकार जताते रहता है। करीबन सभी देशों के साथ होने वाली द्विपक्षीय बातचीत के बाद जो साझा बयान जारी होते हैं उसमें यह जिक्र करवाया जाता है कि दक्षिण चीन सागर एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री इलाका है और वहां दुनिया के नौसैनिक और व्यापारिक पोतों की खुली आवाजाही सुनिश्चित होनी चाहिये। ऐसा इसलिये कहा जाता है कि चीन दक्षिण चीन सागर के इलाके पर एकतरफा कब्जा नहीं कर ले। लेकिन चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग जिस आक्रामक तेवर के साथ अपने दूसरे कार्यकाल में आए हैं उससे तो यही लगता है कि वह दक्षिण चीन सागर के विशाल इलाके पर अपना प्रादेशिक अधिकार जमाने की कोशिश करेंगे और तब बाकी दुनिया को प्रतीक्षा रहेगी कि चीन के इस नापाक कदम का किस तरह मुकाबला किया जाता है।

भारत का आधा से अधिक आयात-निर्यात दक्षिण चीन सागर के इलाके से होकर ही होता है इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह जरूरी है कि यह समुद्री इलाका नौवहन के लिए पूरी तरह खुला रहे। खतरा यही है कि यदि दक्षिण चीन सागर पर चीन का कब्जा हो जाता है तो भारत का आयात-निर्यात चीन की देखरेख में होगा। भारत आने वाले और भारत से दूसरे इलाकों में जाने वाले व्यापारिक जहाजों पर चीन नियंत्रण और नजर रखेगा और चूंकि चीन दक्षिण चीन सागर को अपना प्रादेशिक इलाका बताता है इसलिये वह न केवल भारतीय बल्कि बाकी देशों के व्यापारिक पोतों पर कर लगा सकता है।

यदि ऐसा होने लगा तो दक्षिण चीन सागर में चीन और बाकी देशों के बीच टकराव की स्थिति पैदा होगी  और यदि अमेरिका, जापान,  दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने हिम्मत दिखाई तो वहां सैन्य तनाव का माहौल विकसित हो सकता है। ऐसी स्थिति से बचने के लिये जरूरी है कि चीन के खिलाफ बड़ी ताकतें एकजुटता दिखाएं और चीन से साफ कहें कि अपनी हद में रहे। चीन यदि इसका प्रतिवाद करता है तो दक्षिण चीन सागर झुलस सकता है जिसकी लपटें हिंद महासागर तक भी पहुंच सकती हैं। जरूरी है कि वक्त रहते बड़ी ताकतें चीन की भावी योजनाओं को नाकाम करने के लिये समुचित जमीनी कदम उठाएं। जापान, अमेरिका और भारत की ताजा त्रिपक्षीय बैठक को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।

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