Featured

स्पेशल रिपोर्ट: परमाणु मिसाइल संधि टूटने से हथियारों की नई होड़

रूस की मिसाइल Sarmat
प्रतीकात्मक फोटो

नई दिल्ली। मध्यम दूरी तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों की तैनाती रोकने वाली इंटरमीडियट रेंज न्युक्लियर फोर्सेज (आईएनएफ) संधि से अलग होने का अमेरिका का ऐलान पूरी दुनिया में बैलिस्टिक मिसाइलों की तैनाती की नई होड़ शुरू करेगा।





अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पिछले सप्ताह आईएनएफ संधि से अलग होने का ऐलान कर अमेरिका की नई सामरिक प्राथमिकताओं की ओर इशारा किया था।

अमेरिका का यह बहाना जायज है कि जब चीन आईएनएफ संधि का आदर नहीं कर रहा तो इस तरह की संधि केवल अमेरिका और रूस के बीच ही लागू रखने का कोई व्यावहारिक फायदा नहीं होगा। चीन के अलावा डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस पर भी यह आरोप लगाया था कि वह आईएनएफ संधि की भावनाओं का उल्लंघन कर रहा है औऱ नई नई किस्म की बैलिस्टिक मिसाइलों का विकास और तैनाती कर रहा है जिससे न केवल यूरोप बल्कि बाकी इलाके में भी शक्ति संतुलन प्रभावित हो रहा है। उधर रूस ने भी अमेरिका पर आरोप लगाया था कि वह आईएनएफ संधि की भावनाओं से खिलवाड़ कर रहा है।

लेकिन उत्तरी अटलांतिक संधि संगठन (नाटो ) ने अमेरिका का साथ दिया और रूस पर यह दबाव बनाया कि अगर नई बैलिस्टिक मिसाइलों की तैनाती जारी रखी तो आईएनएफ संधि से नाटो अलग हो जाएगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन का नाम लेकर 02 फरबरी को कहा था कि वह आईएनएफ संधि से बाहर हो रहे हैं। आईएनएफ संधि अमेरिका और रूस के बीच तब सम्पन्न हुई थी जब शीतयुद्ध अपने चरम पर था लेकिन अमेरिका और रूस दोनों यूरोप में बैलिस्टिक मिसाइलों की ब़ढती तैनाती को लेकर यह मानने लगे थे कि इस तैनाती का कोई अंत और सीमा नहीं इसलिये इसकी और अधिक तैनाती रोकने के लिये अमेरिका और रूस को आपसी सहमति बनानी चाहिये। इसी का नतीजा था कि अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ ने इंटरमीडियट रेंज न्युक्लियर फोर्सेज ट्रीटी सम्पन्न की और यूरोप में परस्पर भरोसा का नया दौर शुरू किया। आईएनएफ सधि के तहत पांच सौ से 5,000 किलोमीटर मारक दूरी वाली बैलिस्टिक मिसाइलों की नई तैनाती रोकने पर सहमति बनी थी। इनसे यूरोप की सुरक्षा को भारी खतरा पहुंचने लगा था।

आईएनएफ संधि जून, 1988 में लागू हो चुकी थी। उस जमाने में सोवियत संघ और अमेरिका में तनाव-शैथिल्य का दौर शुरू हो चुका था । इसके तीन साल बाद ही सोवियत संघ का विघटन का दौर शुरू होने लगा और यूरोप मैं सोवियत और अमेरिकी खेमे के देशों के बीच सामंजस्य का दौर शुरू हुआ। लेकिन तब चीन परमाणु बैलिस्टिक मिसाइलों की होड़ में एक गम्भीर खिलाड़ी नहीं माना जाता था इसलिये अमेरिका और रूस ने चीन की नई उभरती सैन्य ताकत की परवाह नहीं की लेकिन अब 21 वीं सदी के दूसरे दशक में चीन जब एशिया में शक्ति संतुलन बिगाड़ने पर तुला हुआ है तब अमेरिका के लिये चिंतित होना स्वाभाविक था।

Comments

Most Popular

To Top