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विशेष रिपोर्टः  भारतीय वायुसेना खरीदेगी 110 फाइटर विमान, कंपनियों के लिए ये हैं शर्तें

राफेल-विमान

नई दिल्ली। भारतीय वायुसेना ने करीब 11 साल बाद वही प्रक्रिया दुहराते हुए 110 लड़ाकू विमानों को हासिल करने का ऐलान किया और दुनिया की चुनिंदा कम्पनियों से सूचना भेजने का आग्रह (आरएफआई) जारी कर दिया। भारतीय वायुसेना द्वारा जारी किये गए विमानों के इस सबसे बडे टेंडर में भी दो और एक इंजन वाले विमानों के लिये विकल्प खुला रखा गया है। ऑर्डर मिलने के बाद इन सभी  विमानों को 12 साल के भीतर सप्लाई करने की शर्त रखी गई है।





विमान 12 वर्ष के भीतर सप्लाई होने की उम्मीद

इसके मद्देनजर यहां माना जा रहा है कि विमान कम्पनियों से मिले जवाब के बाद विमान का उड़ान परीक्षण पूरा करने औऱ कम्पनी का चयन करने में कम से कम दो साल का वक्त लगेगा। इस तरह ये विमान 12 साल के भीतर सप्लाई हो जाने की उम्मीद है। भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों के गिरते स्क्वा़ड्रनों की संख्या के मद्देनजर सरकार का यह फैसला काफी देरी से लिया गया है। वायुसेना के पास लड़ाकू विमानों की क्षमता गिर कर 32 पर रह गई है जब कि 42 स्क्वाड्रन रखने की सिफारिश की गई थी।

पिछली बार 2007 में जारी हुआ था 126 लड़ाकू विमानों का टेंडर

पिछली बार 2007 में 126  लड़ाकू विमानों का टेंडर जारी हुआ था। वायुसेना की चयन टीम ने 2012 में छह लड़ाकू विमानों का परीक्षण करने के बाद फ्रांस के Rafale लड़ाकू विमान को अपनी पहली पसंद बताया था। लेकिन सरकार ने इस सिफारिश पर कार्रवाई रोक कर केवल 36 Rafale विमानों का ऑर्डर फ्रांस की Dassault कम्पनी को दिया।  वायुसेना ने चार यूरोपीय देशों दवारा बनाए गए यूरोपियन फाइटर को दूसरे स्थान पर रखा था। पिछले टेंडर में स्वीडन की साब कम्पनी का ग्रिपेन, रूस का मिग-35 और अमेरिका का एफ-16 और एफ-18  शामिल किया गया था।

टेंडर 20 अरब डॉलर तक हो सकता है, छह कंपनियों के भाग लेने की उम्मीद

इस बार भी उम्मीद है कि लड़ाकू विमान बनाने वाली वही छह कम्पनियां टेंडर में भाग लेंगी। यह टेंडर करीब 20 अरब डालर तक का हो सकता है। रक्षा मंत्रालय द्वारा शुक्रवार को जारी रिक्वेस्ट फार इनफार्मेशन (आरएफआई) में यह साफ किया गया है कि शुरुआती आर्डर के बाद बाकी विमान भारत में ही बनाये जाएंगे। इसके लिये देश की किसी उत्पादन एजेंसी या सामरिक साझेदार का चयन किया जाएगा। विमानों की उत्पादन लागत के बारे में जानकारी मांगी गई और यह भी पूछा गया है कि विमान के जीवन के पहले 15 साल में हर साल मेनटेनेंस पर कितना खर्च आएगा।

भारतीय कंपनी को बतानी होगी तकनीक

आरएफआई में वायुसेना की जरूरत को साफ करते हुए कहा गया है कि विमानों में हवाई श्रेष्ठता, हवाई सुरक्षा, आसमान से जमीन पर वार करने की क्षमता, टोही,  समुद्री,  इलेक्ट्रानिक युद्ध और आसमान में ईंधन भरने की क्षमता होनी चाहिये। आरएफआई में साफ कहा गया है कि विमान सप्लाई का ठेका जीतने वाली कम्पनी को विमान बनाने की तकनीक भारतीय कम्पनी को बतानी होगी। उन्हें यह भी बताना होगा कि किसी खास तकनीक के हस्तांतरण के लिये कम्पनी को अपनी सरकार से अनुमति लेनी होगी या नहीं। यह भी बताना होगा कि विमान का कितना हिस्सा भारत में बनेगा। यह गारंटी भी देनी होगी कि विमानों के बे़ड़े में हमेशा 75 प्रतिशत उपलब्ध रहेंगे।

कम्पनी को शुरुआती आर्डर तीन साल के भीतर पूरा करना होगा और बाद में भारतीय कम्पनी के सहयोग से 12 साल के भीतर सभी विमानों की सप्लाई कर देनी होगी।

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