Featured

अमेरिका से विशेष रिपोर्ट: ईरान से गतिरोध जारी, भारत के लिए विकल्प सीमित हैं..

ईरानी राष्ट्रपति रूहानी और पीएम मोदी

अमेरिका से ललित मोहन बंसल…

अमेरिकी आणविक प्रतिबंधों को लेकर गतिरोध बना हुआ है। शुक्रवार, 6 जुलाई को विएना में हुई बैठक में यूरोपीय समुदाय ने अमेरिकी प्रतिबंधों से होने वाली क्षति की भरपाई की माँग पर ईरान को ‘टका सा’ जवाब दे दिया है। चीन ने तो अमेरिका से ‘ट्रेड वार’ और सेंट्रल एशिया में अपने व्यापारिक हितों के मद्देनज़र रविवार को ईरान से तेल लेने और अमेरिकी कच्चे तेल पर सीमा शुल्क लगाने के संकेत दे दिए है। ईरान से बड़ी मात्रा में तेल लेने वाले देशों में भारत पसोपेश में हैं।





तेल पर निर्भर है ईरान की इकॉनमी

ईरान प्रतिदिन 22 लाख बैरल कच्चा तेल का उत्पादन करता है और उसकी इकॉनमी तेल पर निर्भर है। चीन पच्चीस प्रतिशत तेल लेता है, तो भारत अठारह प्रतिशत। शेष जापान, कोरिया, टर्की और इटली उठा लेते हैं। उधर अमेरिका है, जो आर्थिक प्रतिबंधों के नाम पर ईरान को धूल धूसरित कर देना चाहता है। भारत ने चीन की तरह त्वरित निर्णय नहीं लिया है। उसने नए विकल्प तलाशने शुरू कर दिए हैं। इसके लिए भारत के पास खाड़ी में सऊदी अरब और इराक़ तो हैं ही, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, क़तर जैसे देशों की कमी नहीं हैं। इनके साथ हाल में अच्छे संबंध भी बने हैं। बेशक, कच्चा तेल भारत की लाइफ़ लाइन है। इसके लिए भारत ने प्रयास भी किए हैं। तकलीफ़ है, तो इतनी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान के बावजूद हमने न तो इस पर निर्भरता कम की और ना ही हमारी ‘जनप्रिय’ सरकारों ने जीएसटी के ज़रिए इसे अपनी मुख्य कमाई के मोह से अलग रखा। स्थिति यह है कि ओपेक देशों के तेल उत्पादन में दस लाख बैरल प्रतिदिन वृधि किए जाने के निर्णय के बावजूद तेल की माँग-आपूर्ति पर आधारित तेल की क़ीमतें लगातार बढ़ रही हैं। भारत में पेट्रोल की प्रति लीटर दर अमेरिका में गैसोलीन से ज़्यादा है। अमेरिकी कम्पनियों- शेवरान, शेल और आर के आदि में पारस्परिक प्रतिस्पर्धा से एक ही स्टेट में प्रति गैलन आधा डालर (34 रु॰) से अधिक का फ़र्क़ है।

भारत का अस्सी फीसदी तेल सऊदी अरब, इराक और ईरान से आता है

बहरहाल, भारत अपनी अस्सी प्रतिशत तेल की खपत के लिए सऊदी अरब, इराक़ और ईरान पर निर्भर है। पिछली बार अमेरिका ने सन 2012 में ईरान के यूरेनियम संवर्धन के नाम पर प्रतिबंध लगाए थे, तब भारत ने कालांतर में ईरान पर तेल की निर्भरता में कटौती कर और इस से मिली छूट का लाभ उठा कर अपने पुराने मित्र ईरान से आधी आपूर्ति बनाए रखी थी, और जैसे ही 2015 में प्रतिबंध ख़त्म हुए, भारत ने शिया प्रधान ईरान के साथ पुराने सांस्कृतिक और सेंट्रल एशिया में व्यापारिक संबंध बढ़ाए जाने की गरज से फिर क़रीब-क़रीब पहले की तरह आपूर्ति शुरू कर दी। निस्सन्देह, इसमें भारत और अमेरिका, दोनों के हित थे।

भारत ने ईरान के ‘स्ट्रेट आफ होर्मुज’ तट पर चाहबहार बंदरगाह के ज़रिए अफ़ग़ानिस्तान के व्यापारिक हितों के साथ इस बंदरगाह को सेंट्रल एशिया के साथ आर्थिक विकास का एक द्वार के रूप में प्रस्तुत किया था। अमेरिका इस स्थिति से पूरी तरह वाक़िफ़ है। एक ओर क्षेत्र में चीन के मंसूबों और पाकिस्तान के प्रति लगातार बढ़ती अविश्वसनीयता से अमेरिका चौकस है, तो अरबों डालर की मदद पर टिके अफगानिस्तान में 17 वर्षों के ख़ूनी संघर्ष के बावजूद तालिबान चुनौती बना हुआ है। ऐसी स्थिति में दक्षिण एशिया में सामरिक दृष्टि से भारत से अधिक अमेरिका के लिए कौन बेहतर दोस्त हो सकता है? भारत इस स्थिति से वाक़िफ़ है। पिछली मई में ट्रम्प प्रशासन ने चुनावी वादों अथवा घरेलू राजनीति के दबाव में जब ओबामा के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के छह देशों के संयुक्त प्रयासों से बनी आणविक संधि को एक ‘ख़राब डील’ कर हाथ खींचे और ईरान पर दोबारा आर्थिक प्रतिबंध लगाए, तो भारत सरकार ने भी अमेरिका की इस कार्रवाई की न तो निंदा की और न ही सराहना। दुनिया भर में इसे भारतीय कूटनीति की एक अच्छी मिसाल बताया गया। अब स्थितियाँ बदल चुकी हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प निर्णय अपने अहम और एक व्यापारिक दृष्टिकोण से लेते हैं। लचीले भी ख़ूब हैं, समय, काल और परिस्थिति के अनुसार बाख़ूबी नेतृत्व करना जानते हैं, जबकि पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा हो अथवा उन से पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति साझे हितों की बुनियाद पर नेतृत्व करना चाहते थे। इस स्थिति से अमेरिका के दसों दशकों पुराने मित्र, ग्रुप जी 7, नाटो और यहाँ तक कि यूएनओ भी वाक़िफ़ हैं।

अमेरिकी विदेश विभाग की चेतावनी

अमेरिकी विदेश विभाग ने हाल ही में भारत और चीन के नाम का उल्लेख करते हुए उन सभी देशों को चेतावनी दी है कि वे 4 नवम्बर के बाद ईरान से किसी तरह का सम्बंध रखेंगे, तो अमेरिका उनके ख़िलाफ़ कड़ी कारवाई करेगा। ऐसी स्थिति में ट्रम्प प्रशासन भारत को कोई छूट अथवा रियायत देगा, एक टेढ़ा सवाल है।

यहाँ मूल सवाल है कि जब यूरोपीय समुदाय ने विदेश मंत्रियों की बैठक में घंटो विचार-विमर्श के बाद ईरान में एक के बाद एक कारोबार छोड़ कर जाने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से होने वाली क्षति पर पैकेज देने में असमर्थता दिखाई और बैठक आगे भी जारी रखने में सहमति दिखाई थी, तब इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड को त्वरित प्रतिक्रिया में स्ट्रेट आफ होर्मुज से पश्चिमी देशों के लिए जाने वाले जहाज़ों का मार्ग बंद करने की चेतावनी देने का क्या औचित्य था। इस पर फ़्रांस के विदेश मंत्री जीन वाई डी रियान ने ईरानी विदेश मंत्री जावेद जरीफ पर तंज कसते हुए यह कहना पड़ा कि वह यूरोपीय देशों को धमकी देना बंद करें। इस्लामिक गार्ड की दिक़्क़त यह है कि वह राष्ट्रपति रूहानी अथवा उनके किसी मंत्री की नहीं, सीधे आध्यात्मिक गुरु आयतुल्ला खमेनी की सुनते हैं। रूहानी ने भी तो खमेनी और उनके मुल्लाओं के दबाव में आकर यूरोपीय देशों को धमकी दी थी कि उन्हें पैकेज नहीं मिला तो वह सँवर्धित यूरेनियम निर्मित करना शुरू कर देंगे। कहा जाता है, ईरान के दो बार के उदारवादी राष्ट्रपति हसन रूहानी के स्वभाव में धमकी देना नहीं है।

ठीक नहीं है ईरान की आर्थिक हालत

असल में ईरान की आर्थिक स्थिति ख़राब है। बेरोज़गारी बढ़ रही है, युवा सड़क पर नारेबाज़ी कर रहे हैं, डालर के मुक़ाबले रियाल रसातल की ओर जा रहा है। उधर ईरान के आध्यात्मिक नेता आयतुल्ला खमेनी आणविक डील को लेकर पहले से ही नाराज़ चले आ रहे हैं। अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव के कारण बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपना कारोबार समेटेने में लगी हैं। अमेरिका की ओर से 4 नवंबर तक कारोबार समेटने के निर्देशों के भय से यूरोपीय इन्वेस्टमेंट बैंक ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का सहयोग करना बंद कर दिया है। फिर ऐसी स्थिति में चीन तेल के बदले डालर में नहीं, चीनी मुद्रा युआन में और भारत कालांतर में अगली नवंबर तक अपनी तेल आपूर्ति घटा कर रू॰ में क़ीमत चुकाना चाहते हैं।यहाँ भारत की भी दिक़्क़त है। वह जियो पोलिटिकल और जियो इकोनोमिक संबंधों को महत्व देता है, इसलिए अपने अमेरिकी हितों की भी तिलांजलि नहीं दे सकता। इस संदर्भ में अमेरिकी विदेश विभाग ने ईरान से कमोबेश तेल की आधी आपूर्ति पर सहमति जता दी है। यह भारत और ईरान दोनों के लिए सुखद ख़बर है। इस दिशा में भारतीय तेल कम्पनियों ने कार्रवाई भी शुरू कर दी है।

भारत के लिए ईरान से संबंध बनाए रखना जरूरी

चीन जो ख़ुद सेंट्रल एशिया में ग्वादर बंदरगाह के माध्यम से कारोबार बढ़ाना चाहता है, भारत के लिए कभी भी सिरदर्द बन सकता है। इसलिए भारत के पास भी ईरान से संबंध बनाए रखना ज़रूरी है। प्रधान मंत्री नरेंद मोदी और हसन रूहानी ने अपनी यात्राओं में इसी तरह प्रगाढ़ संबंध बनाए रखने पर ज़ोर दिया है।

हसन रूहानी विवश क्यों हैं ?

इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड और उनके कठमुल्ला नेताओँ के आक्रामक तेवरों से हसन रूहानी विवश हैं। उन्होंने यह जानते हुए भी कि ईरान खाड़ी में तेल के टैंकरों की आवाजाही के लिए अन्तर्राष्ट्रीय समुद्री विधान से बांधा हुआ है। फिर भी उन्हें ‘स्ट्रेट आफ होर्मुज’ का नाम लिए बिना खाड़ी में अन्य सभी तेल टैंकरों के परिवहन को ठप्प कर दिए जाने की चेतावनी देनी पड़ी । ‘अल जज़ीरा’ के अनुसार स्ट्रेट आफ होर्मुज के नाम पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड जब तब धमकी देता आया है, पर हर बार उसकी धमकी बंदर घुड़की साबित हुई है। हसन रूहानी ने स्ट्रेट आफ होर्मुज का नाम लिए बिना जो धमकी दी है, वह उनकी हताशा व्यक्त करती है। सच यह है कि यह होर्मुज पश्चिमी देशों के तेल टैंकरों के लिए मुख्य रणनीतिक मार्ग है। यहाँ से प्रतिदिन दुनिया का एक तिहाई तेल का आवागमन होता है। ‘टैंकर ट्रैकर डाट काम’ की माने तो उसकी एक ख़बर के अनुसार ईरान ने गत जून में प्रति दिन पाँच लाख 60 हज़ार बैरल कच्चा तेल चीन और भारत को तथा जापान और कोरिया को साढ़े चार लाख बैरल तेल की आपूर्ति की है। अमेरिका इस स्थिति से वाक़िफ़ है। इस पर अमेरिकी मिलिट्री सतर्क हो गई। ओमान में अमेरिकी मिलिट्री अड्डे हैं। अमेरिकी मिलिट्री के सेंट्रल कमान के प्रवक्ता कैप्टन बिल अर्बन ने सहयोगी खाड़ी देशों को आश्वस्त किया की यूएस मिलिट्री तैयार है। वह मित्र देशों के तेल के टैंकरों की हर सम्भव सुरक्षा करेगी। इसके बावजूद विएना काँफ़्रेंस के बाद इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्डके कमांडर इस्माइल कवोसारीने ‘होर्मुज स्ट्रेट’ का उल्लेख करते हुए धमकी दे दी? होर्मुज स्ट्रेट के उत्तरी तट पर ईरान है, तो दक्षिणी तट पर ओमान और संयुक्त अमीरात का स्वामित्व है। समुद्री परिवहन के अन्यान्य संधियों में स्ट्रेट आफ होर्मुज में भी तेल के जहाज़ों का परिवहन संधि के ज़रिए होता है।

 

Comments

Most Popular

To Top