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खास रिपोर्ट: साइबर दुनिया में चीन की चुनौती से मुकाबले के लिये 8 देश हुए एकजुट

साइबर वर्ल्ड में बढ़ता चीन का दबदबा
फाइल फोटो

नई  दिल्ली। साइबर स्पेस में चीन की चुनौती का मुकाबला करने के लिये अमेरिका सहित आठ सहयोगी देशों ने एकजुट होकर एक नया गठजोड़ स्थापित किया है। साइबर दुनिया पर चीन के बढ़ते दबदबे से परेशान अमेरिका के सहयोगी देशों के गठजोड़ का नाम ‘फाइव आईज- प्लस थ्री’ रखा गया है।





फाइव आईज का मतलब है अंग्रेजी बोलने वाले पांच देश और प्लस थ्री में जर्मनी, जापान और फ्रांस शामिल हैं। अंग्रेजी बोलने वाले देश हैं- अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा और न्यूजीलैंड।

इन देशों ने साइबर की दुनिया में चीन की संदिग्ध गतिविधियों का मुकाबला करने के लिये आपसी सहयोग करने का फैसला किया है। इन आठ देशों ने सूचना के आपसी  आदान-प्रदान  का एक नया ढांचा बनाया है जिसके तहत आठों देश आपसी सहयोग करेंगे। इन सभी देशों के साइबर विशेषज्ञ जब यह देखेंगे कि साइबर की दुनिया में कोई संदिग्ध गतिविधि हो रही है तब वे तत्काल उन पर नजर गहरी करेंगे और सहयोगी देशों को इनकी सूचना तुरंत देंगे।

चीनी खतरों के मद्देनजर जापान ने तो अपने सरकारी कार्यालयों में चीनी कम्पनियों द्वारा बनाए गए दूरसंचार उपकरणों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। इसके अलावा जापान ने तो क्लाउड डेटा स्टोरेज में मौजूद आंकड़ों को बचाने के लिये कड़े सुरक्षा उपाय लागू किये हैं।

जापानी अखबार मैनिची में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक आठों देशों ने सूचना आदान-प्रदान के लिये आपसी सहयोग की सहमति की है। गौरतलब है कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फाइव आईज के देशों ने सिग्नल इटेलीजेंस एग्रीमेंट किया था। कहा जा रहा है कि इसी तर्ज पर आठों देशों ने ताजा समझौता किया है।

उल्लेखनीय है कि अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों जापान, जर्मनी और फ्रांस  को चेतावनी दी थी कि अपने दूरसंचार उपकरणों के जरिये चीनी सेना  ऑनलाइन दुनिया में घुसपैठ कर सकती है। चीन द्वारा सूचना की चोरी और साइबर हमलों को लेकर अमेरिका ने अक्सर गहरी चिंता जाहिर की है।

पश्चिमी देशों की सरकारें चीनी कम्पनियों की फाइव- जी तकनीक में बढ़ते दबदबे से भी  चिंतित हैं। चीन इस क्षमता के बल पर किसी भी देश के सूचना भंडार में घुसपैठ कर सकता है। इसीलिये अमेरिकी सरकार ने चीनी ह्वावेई और जेडटीई कम्पनियों को अमेरिका में सरकारी खरीद में भाग लेने से रोक दिया है। अमेरिका इसके लिये कड़े सुरक्षा मानक अपना रहा है जिसका  इस्तेमाल जापान भी करने लगा है।

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