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नक्सल क्षेत्रों में किसी जोखिम से कम नहीं MPV !

माइन प्रोटेक्टिव व्हीकल

रायपुर। नक्सलियों से लड़ाई में कैसे बचे जवानों की जान, इस बात को लेकर बड़े अधिकारी भी रणनीति बनाने में लगे रहते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि माइन प्रोटेक्टिव व्हीकल (एमपीवी) का इस्तेमाल जवानों को क्यों भारी पड़ रहा है ? नक्सली इलाकों में एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुरक्षित बैठकर जाने के लिए जवानों को इसका इस्तेमाल करना पड़ता है। इसकी अहम वजह यही बताई जाती है कि जवानों के पास इसके अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है।  जवानों को हिदायत के बाद भी इसका उपयोग किया जाता है।





दरअसल नक्सली इलाकों में दूसरे वाहनों की तुलना में एमपीवी फिर भी कुछ सुरक्षित है। आम वाहनों को तो मामूली विस्फोट से भी नक्सली उड़ा देते हैं। एमपीवी के लिए उन्हें भी तैयारी करनी पड़ती है। नक्सलियों को मालूम होता है कि यह वाहन 20 किलो तक बारूद की क्षमता झेल सकता है। इसलिए इसे उड़ाने के लिए खास तैयारी उन्हें भी करनी पड़ती है। वर्ष 2005 से लेकर अब तक 13 सालों में बस्तर में एमपीवी वाहन उड़ाने की कुल 8 घटनाएं हुई हैं। इन घटनाओं में लगभग 47 जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी जबकि 42 गंभीर रूप से घायल हुए। इन घटनाओं के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि एमपीवी हर लिहाज से सुरक्षित नहीं है, फिर भी इसका इस्तेमाल जारी है क्योंकि उनके पास दूसरा कोई ऑप्शन नहीं।

13 मार्च को किस्टारम में हुए विस्फोट के बाद एक बार फिर से फोर्स के लिए यह एडवाइजरी जारी की गई है कि एमपीवी का उपयोग न किया जाए। फिलहाल इस निर्देश का कितना असर भविष्य में देखने को मिलेगा कहना मुश्किल है। इस एडवाइजरी को लेकर पुलिस के सीनियर अधिकारी भी आशंकित हैं।

एक अखबार के मुताबिक आला अधिकारियों ने बताया कि बस्तर में फोर्स की हर पोस्ट पर एक-दो एमपीवी हैं। जवान तो पैदल चल लेते हैं लेकिन सामान पहुंचाने के लिए इसकी जरूरत पड़ती ही है। एमपीवी को विस्फोट कर उड़ाने की सबसे बड़ी घटना बीजापुर जिले के पोंजेर में हुई थी। इसमें सीआरपीएफ के 22 जवान शहीद हो गए थे।

MPV को भारी विस्फोट कर उड़ाने की घटनाएं

साल 2003 को छत्तीसगढ़ नारायणपुर के भरडा में नक्सलियों ने पहली बार एंटी लैंड माइंस उड़ाया जिसमें तीन जवान शहीद हुए और एक घायल हुआ था। मई 2005 में नारायणपुर में एक बार फिर विस्फोट किया लेकिन वाहन क्षतिग्रस्त होने से बच गया। इससे उन्हें अनुमान हो गया कि इसे उड़ाने में कितना बारूद लगेगा। इसके बाद साल 2006 को उन्होंने सबसे बड़ी घटना को अंजाम दिया। बीजापुर जिले के पोंजेर में इस घटना में 22 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे। 9 जून 2011 को दंतेवाड़ा के गाटम में 8 एसपीओ और 2 डीएफ के जवान शहीद हुए जबकि 13 मार्च 2018 को किस्टरम में नौ जवान शहीद हुए थे।

छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी के अनुसार एमपीवी का इस्तेमाल कभी-कभार ही किया जाता है। इसका कोई विकल्प नहीं है। उन इलाकों में पैदल ही चलना पड़ता है। सतर्कता रखी जाती है फिर भी कभी-कभार घटना हो जाती है।

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