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मोदी का चीन दौराः रिश्ते सुधरें तो भारत-चीन मिलकर सारी दुनिया पर राज कर सकते हैं

पीएम मोदी और शी जिनपिंग

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का इस सप्ताहांत हो रहा चीन दौरा क्या भारत औऱ चीन के रिश्तों को सौहार्दपूर्ण रास्ते पर ले जाने में कामयाब होगा? आखिर क्या बात है कि 27 व 28 अप्रैल को  प्रधानमंत्री मोदी के अचानक चीन दौरे का एलान किया गया ? क्या चीन के ऊहान शहर में प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग की मुलाकात दुनिया में एक नये सामरिक समीकरण के बीज रोपेगी?





क्या भारतीय हाथी और चीनी ड्रैगन एक साथ नाचेंगे ?

पेइचिंग में भारत औऱ चीन के विदेश मंत्रियों ने प्रधानमंत्री मोदी के चीन दौरे की तारीख का एलान कर सामरिक हलकों में भारी उत्सुकता पैदा की है कि क्या भारतीय हाथी और चीनी ड्रैगन एक साथ नाचेंगे? क्या हाथी और ड्रैगन में कोई मेल है?

कुछ इसी तरह के सवाल भारत और चीन के ही नहीं दुनिया के सामरिक हलकों में उठने लगे हैं। भारत औऱ चीन की आपस में दोस्ती बहाल होगी तो न केवल भारत औऱ चीन की सीमाएं तनाव रहित हो जाएंगी बल्कि चीन से दोस्ती पर घमंड करने वाले भारत के प़ड़ोसी देशों के राजनीतिक समीकरण भी बिगड़ जाएंगे। 1.30 अरब की आबादी वाला भारत और 1.40 अरब की आबादी वाले चीन यानी दुनिया की एक तिहाई आबादी की आपसी गांठें मजबूत होंगी तो पूरी दुनिया का शक्ति संतुलन भारत औऱ चीन के पक्ष में झुक जाएगा और अमेरिका व यूरोपीय देश इस एकजुट ताकत के समक्ष झुकने को मजबूर होंगे। लेकिन क्या यह महज दिवास्वप्न ही साबित होगा। भारत और चीन के बीच आपसी मसलों को लेकर इतने गहरे मतभेद हैं कि दोनों देशों के लोगों के दिलोदिमाग पर ये हमेशा छाए रहेंगे।

आपसी मतभेदों के मसलों पर दो टूक बातचीत संभव

प्रधानमंत्री मोदी भारत और चीन के बीच चल रही राजनयिक औऱ सैन्य तनातनी को समाप्त करने के इरादे से चीन जा रहे हैं। हालांकि आगामी जून में ही चीन के छिंगताओ शहर में शांघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की शिखर बैठक होने वाली है और इसमें भाग लेने के लिये प्रधानमंत्री मोदी को चीन जाना ही था इसलिये क्या जरुरत पड़ गई कि मोदी को इसके पहले चीन जाना प़ड़ रहा है? शायद इसलिये कि  उनकी राष्ट्रपति शी चिन फिंग के साथ आपसी मतभेद के मसलों पर विस्तार से दो टूक बातचीत हो सके।

भारत की चिंता जल्द सुलझे सीमा विवाद

भारत की चिंता है कि चीन जल्द से जल्द सीमा विवाद को सुलझाए, पाकिस्तान में रह रहे आतंकवादी मसूद अजहर के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंध लगाने में चीन अड़ंगा नहीं डाले, 48 देशों के न्युक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत को सदस्यता मिलने में बाधक नहीं बने। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिये चीन भारत का विरोध नहीं करे और भारत चीन व्यापार में संतुलन लाने की कोशिश करे।

चीन की चिंता

दूसरी और चीन की चिंता है कि तिब्बत मसले पर भारत तिब्बतियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाए, दलाई लामा को सरकारी सम्मान नहीं दे और उन्हें अरुणाचल प्रदेश जाने से रोके। चीन की एक बड़ी चिंता यह है कि चीन द्वारा प्रवर्तित वन रोड वन बेल्ट (ओबोर) में भारत न केवल शामिल हो बल्कि इसका समर्थन भी करे। दक्षिण चीन सागर पर चीन के एकाधिकार का भारत विरोध नहीं करे।

दोनों देशों की कुछ चिंताएं ऐसी हैं कि उन्हें रातोंरात नहीं सुलझाया जा सकता। फिर भी चीन चाहे तो आतंकवादी मसूद अजहर के खिलाफ प्रतिबंध लगाने में मदद कर सकता है, न्युक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत की सदस्यता में अडंगा हटा सकता है और भारत-चीन व्यापार में संतुलन लाने के लिये नीतिगत बदलाव ला सकता है।

दूसरी ओर भारत चाहे तो दलाई लामा के मुख्यालय धर्मशाला में वहां की निर्वासित सरकार को निष्क्रिय कर सकता है,  ओबोर में शामिल हो कर चीन की प्रतिष्ठा बढा सकता है और भारत के प़डोसी देशों में चीन के दखल को नजरअंदाज कर सकता है।

दोनों देशों के आला राजनीतिक नेतृत्व में समुचित संकल्प हो तो रिश्तों में बाधक बन रही इन छोटी कठिनाइयों को जड़ से हटाया जा सकता है। यदि दोनों देश सीमा मसले को भी जल्द से जल्द सुलझा लें तो सोने पर सुहागा।

सीमा पर शांति के माहौल से बच सकते हैं हजारों करोड़ रुपये

यदि सीमा पर शांति का माहौल बना तो वहां की चौकसी और सुरक्षा के लिये हजारों करोड़ रुपये के अनावश्यक खर्च से भारतीय सेना बच सकती है। वक्त आ गया है कि दोनों देश आपसी रिश्ते सुधार कर दो हजार साल पुराने रिश्तों में पैदा मिठास को फिर से बहाल करें। दोनों देशों के बीच आपसी रिश्ते सुधरे तो दोनों देश मिल कर सारी दुनिया पर राज कर सकते हैं। तब 21 वीं सदी वाकई में भारत औऱ चीन के नाम लिखी जाएगी।

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