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इमरान खान को भारत से बाद में, पहले आर्थिक फ़्रंट पर लड़ाई लड़नी होगी!

इमरान खान

लॉस एंजेल्स से ललित मोहन बंसल..

क्रिकेट पिच पर प्रतिद्वंद्वी बल्लेबाज़ पर बाउंसर बरसाने और 1992 में विश्व चैम्पियन टीम के नायक इमरान खान को प्रधान मंत्री के रूप में पहले आर्थिक फ़्रंट पर लड़ाई लड़नी होगी। देश में भ्रष्टाचार के नाम पर जंग में सेना और ख़ुफ़िया एजेंसी के बलबूते 65 वर्षीय इमरान खान वर्षों से जमे-जमाए प्रतिपक्षी दलों-पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के महारथियों को परास्त करने में भले ही सफल हो गए हैं, अभी उन्हें देश को आर्थिक रूसवाई से बचाने के लिए आईएमएफ से जूझना होगा। आईएमएफ के अनुसार अगले पाँच साल अंधकारमय हो सकते हैं।





सेना की जुबान बोलने वाले इमरान का यू टर्न

अभी फ़िलहाल, नवनिर्वाचित प्रधान मंत्री इमरान खान को मित्र देशों, ख़ास कर चीन और सऊदी अरब से बधाइयाँ मिलनी शुरू हो गई हैं। उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ लेने के तुरंत बाद आर्थिक फ़्रंट पर लड़ाई के लिए इन दोनों मित्रों से गुहार लगानी होगी। चीन-पाकिस्तान गलियारे में फ़िज़ूलख़र्ची और कथित भ्रष्टाचार के नाम पर सेना की ज़ुबान में सस्वर बोलने वाले इमरान खान ने वस्तु स्थिति को भाँपते हुए यू टर्न ले लिया है। उन्होंने मतगणना के बाद बढ़त मिलने पर पहले ही दिन ‘विजय मंच’ से चीन से मित्रता के लिए हाथ बढ़ा दिया। अपने देश की ग़रीबी हटाने, रोज़गार बढ़ाने और संसाधन जुटाने के लिए शीघ्र एक प्रतिनिधि मंडल भी चीन भेजने की घोषणा कर डाली।

पाकिस्तान में नई सरकार के लिए इसकी ज़रूरत भी थी और एक रवायत भी। चीन ने भी पिछले एक दशक में पहले पीपल्स पार्टी की ज़रदारी सरकार से और फिर मुस्लिम लीग-नवाज़ सरकार से सामरिक संबंध क़ायम करते हुए अपने ख़ज़ाने का मूँह खोल दिया था। चीन के शक्तिसम्पन्न राष्ट्रपति शि चिन फिंग ने अपनी महत्वाकांक्षी ‘वन बेल्ट वन रोड’ परियोजना के तहत एक माडल गलियारे के रूप में सब से पहले पाकिस्तान को चुना। एक बार खुली छूट मिलने के बाद चीन ने 62 अरब डालर की विस्तृत योजना के तहत सड़क, रेल मार्ग, ग्वादर बंदरगाह से समुद्र और समुद्र में आप्टिक फ़ाइबर लाइन का जाल बिछाने के सस्ती दरों पर ऋण मुहैया कराने में कोई क़ोताही नहीं की। इसके लिए चीन ने ऋण तो दिया ही, इंफ़्रास्ट्रक्चर में नामी निर्माण कम्पनियों के हज़ारों इंजीनियरों को भी काम में झोंक दिया। पिछले पाँच सालों में उन्नीस अरब डालर के काम भी पूरे हो चुके हैं। इस गलियारे को स्वावलंबी बनाने और चीन-पाकिस्तान सीमा से माल के आवागमन के लिए परिवहन सुविधाओं, ऊर्जा संयंत्र, विद्युत ग्रिड, पीने के पानी का जाल बिछाने और जगह जगह मूलभूत सुविधाएँ खड़ी करने के काम भी जारी हैं। सेना ने चीनी निवेश और चीनी कम्पनियों की ओर से निर्माण कार्य में ‘किक बैक’ के नाम पर अपदस्थ प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ पर आरोप लगवाए थे, फिर न्यायपालिका पर दबाव डाल कर उन्हें दस साल की सज़ा और देश की अदियाला जेल में बंद भी कराया था। सेना ने आर्थिक मदद के लिए सऊदी अरब में अपने सैनिक भेजे, पर आर्थिक मदद मिली नहीं।

पाकिस्तान पर है 103 अरब डॉलर का विदेशी ऋण

आज पाकिस्तान पर कुल 103 अरब डालर का विदेशी ऋण है, जबकि उसे वर्ष 2018-19 के लिए आईएमएफ से कम से कम 27 अरब डालर के ऋण की ज़रूरत होगी। अभी जून तक आईएमएफ का 93 अरब डालर का ऋण हो चुका है। इसे घरेलू वितीय स्थिति और आईएमएफ के नियमों के अनुसार ज़्यादा माना जा रहा है। हालाँकि पिछले चार सालों में आईएमएफ का ऋण बढ़ता जा रहा है। इसके लिए आईएमएफ बीच-बीच में चेतावनी भी देता रहा है कि पाकिस्तान सरकार को विदेशी ऋणों और घरेलू वित्तीय फ़्रंट पर चुनौतियों को संभालने की ज़रूरत है। इकानमी की स्थिति यह है कि उसे उच्चतम विकास दर से जूझना होगा। फ़िलहाल अगले दो सालों में 3.1 प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगाया जा रहा है। यह नई सरकार के लिए चुनौती होगी।

करंट अकाउंट में सिर्फ डेढ़ माह का रिजर्व फंड, महंगाई आसमान पर

पाकिस्तान का करंट अकाउंट में मात्र डेढ़ माह का रिज़र्व फ़ंड 9.8 अरब डालर शेष है। पाकिस्तानी रूपए का अवमूल्यन लगातार कम हो रहा है, जो पिछले महीने एक डालर के मुक़ाबले 128.7 रुपये पर आ गया है। इस से विदेशी माल महँगा होता जा रहा है, मुद्रास्फीति रिकार्ड 7.1 प्रतिशत तक जा पहुँची है। इस पर आईएमएफ, जो पिछले दो महीनों से आठ से दस अरब डालर की ऋण अदायगी के लिए दबाव बनाए हुए था, कामचलाऊ अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री से मिल कर समस्या का निदान करने की बजाए नई सरकार के गठन की प्रतीक्षा कर रहा था। नई सरकार में इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ़ के सीनियर नेताओं ने कहना शुरू कर दिया है कि वे आईएमएफ से साल की दूसरी ‘बेल आउट’ के लिए प्रयास कर सकते हैं। लेकिन जानकारों का कहना है कि कच्चे तेल की क़ीमतों में लगातार वृधि और करंट खाते में जकड़न से स्थितियाँ प्रतिकूल हो सकती हैं। इस स्थिति में पाकिस्तान को चीन के भरोसे एक बार फिर मोहलत मिल जाएगी, लेकिन क्या इमरान सरकार को ‘इस्लामिक वेलफ़ेयर स्टेट’ के सपने को साकार करने के लिए जैसे-तैसे ख़र्च करने की इजाज़त मिलेगी? एक टेढ़ा सवाल है।

दो साल बाद चुकाना होगा चीन का ऋण

अब तो आईएमएफ में मध्य एशिया और सेंट्रल एशिया के पाकिस्तान में जन्मे निदेशक गत मार्च में स्थांतरित हो चुके हैं और उनके स्थान पर लेबनान के पूर्व वित्त मंत्री जिहाद अजूर ने कड़ा रुख़ अपनाते हुए नई सरकार से ऋण अदायगी के मामले में सीधे प्रधानमंत्री से दो टूक बातचीत करने के संकेत भी दे दिए है। पिछले दिनों करंट अकाउंट में रिज़र्व फ़ंड की कमी के कारण चीन ने कमर्शियल ब्याज दरों पर एक अरब डालर का क़र्ज़ पाकिस्तान को दिया था। इस पर पाकिस्तान के अर्थशास्त्री नदीम ने ब्याज रहित ऋण की गुहार लगाई थी, जिसे चीन ने सिरे से इनकार किया था। पाकिस्तान के सामने दूसरी बड़ी ऋण अदायगी की समस्या चीन से उठने वाली है। पाकिस्तान-चीन गलियारे के लिए 62 अरब डालर की ऋण अदायगी के रूप में दो साल बाद साढ़े तीन से चार अरब डालर की मय ब्याज अदायगी करना ज़रूरी होगा। इस विषय से जुड़े जानकारों का कहना है की मात्र तीन सौ अरब डालर की जीडीपी के बलबूते पर टिकी पाकिस्तान सरकार की ओर से इतनी बड़ी ऋण अदायगी असंभव है।

अमेरिका ने रोकी मदद

अमेरिका पिछले सालों में पाकिस्तान को सन 2011 तक 65 अरब की आर्थिक और मिलिट्री सहायता दे चुका है, जबकि सन 2011से 2014 के बीच अमेरिका ने साढ़े सात अरब का पैकेज दिया था। ट्रम्प प्रशासन ने आते ही न केवल सभी आर्थिक सहायता रोक दी है, बल्कि ट्रम्प ने नव वर्ष के मौक़े पर यह ट्वीट कर पाकिस्तान के मूँह पर थप्पड़ जड़ दिया है कि उन्हें आर्थिक मदद के रूप में झूठ और फ़रेब के सिवा मिला क्या है? पाकिस्तान अभी तक अमेरिकी नेताओं को बेवक़ूफ़ बनाता आया है। इसके साथ ही अमेरिका ने गत जनवरी में 1.3 अरब डालर की बाकाया आर्थिक मदद भी रोक दी थी ।

 

 

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