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इस जवान ने झेली थीं 7 गोलियां, अब पॉलीथिन में आंत लेकर भटकने को है मजबूर

सीआरपीएफ के जवान मनोज तोमर
सीआरपीएफ के जवान मनोज तोमर (फाइल)

नई दिल्ली। ‘जाको राखे साईंया मार सके न कोई’ वाली कहावत सीआरपीएफ जवान की जिंदगी पर एकदम खरी उतरती है, इसलिए कि जब साल 2014 में नक्सलियों ने घात लगाकर सीआरपीएफ दल पर हमला कर दिया था तो जवान मनोज तोमर को 7 गोलियां लगी थीं। इस हमले में 11 जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। जाबांज मनोज ने मौत को मात दे दी लेकिन अब इलाज के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। एक अखबार ने इस जवान की व्यथा बयान की है।





अफसरों से लेकर मंत्रियों तक उनके परिजनों की मदद का आश्वासन तो सभी ने दिया मनोज तोमर आज भी अपनी आंत को पॉलीथिन में रखकर इलाज के लिए दर-दर भटक रहा है। यह जवान मध्य प्रदेश के मुरैना का रहने वाला है।

अखबार के मुताबिक झीरम घाटी में नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में उनके पेट में सात गोलियां लगने से आंत बाहर आ गई। गंभीर रूप से घायल होने के कारण उस वक्त आंत को पेट में रखना संभव नहीं था। डॉक्टरों ने उसे बाहर ही रखने को कहा। अब आंत को पेट के अंदर रखा जा सकता है। पर उनके पास ऑपरेशन के इतने पैसे नहीं हैं कि इसका एक बार फिर इलाज कराया जा सके। गोली लगने से मनोज की एक आंख की रोशनी भी चली गई है।

नियमों से जवान को है शिकायत

मनोज के मुताबिक उनकी शिकायत सीआरपीएफ से नहीं है बल्कि सरकार के नियमों से है। नियम कहता है कि वे छत्तीसगढ़ में ड्यूटी के दौरान जख्मी हुए थे इसलिए उनका उपचार अनुबंधित रायपुर के नारायण अस्पताल में ही होगा, जबकि वहां पूर्ण इलाज संभव नहीं है। सरकार एम्स में आंत के ऑपरेशन और चेन्नई में आंख के ऑपरेशन का इंतजाम करवा सकती है, जो अब तक नहीं हो रहा है। जवान मनोज परेशानियों को दरकिनार करते हुए नियमित चेकअप के लिए रायपुर के नारायण अस्पताल जाते रहते हैं।

CRPF जवान को अब पॉलीथिन में आंत लेकर भटकने की जरूरत नहीं, खर्च उठाएगी सरकार

लगातार 08 साल तक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सुरक्षा दल में भी रह चुके मनोज को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से पांच लाख रुपये की सहायता का आश्वासन भी मिला, लेकिन मदद आज तक नहीं पहुंची। विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा ऑपरेशन के बाद मनोज की आंत पेट में रखी जा सकती है और फिर वह सामान्य जीवन व्यतीत कर सकते हैं। आंख की रोशनी वापस लाई जा सकती है, पर दोनों के इलाज का संभावित खर्च 5-7 लाख रुपये है। इसकी व्यवस्था निजी स्तर पर हो पाना उनके लिए संभव नहीं हो रहा है।

11 जवानों में जिंदा बचे इकलौते जवान

जवान मनोज तोमर 11 मार्च, 2014 को छ्त्तीसगढ़ के सुकमा जिले के दोरनापाल थाना क्षेत्र में थे। घटना वाले दिन सुबह आठ बजे वह टीम के साथ तलाशा अभियान के लिए झीरम घाटी की तरफ निकले थे। तभी घात लगाकर 300 से ज्यादा नक्सलियों ने उनकी टीम पर गोलीबारी शुरू कर दी। इस वारदात में 11 जवानों ने अपनी जान गंवाई, जिसमें केवल मनोज तोमर ही अकेले जवान थे जो बच गए थे।

रक्षक न्यूज की राय:

सीआरपीएफ के एक जवान मनोज तोमर का मामला नियमों से बंधी सरकार की आंख खोलने वाला है। ड्यूटी के दौरान नक्सलियों की गोली से घायल हुए इस जवान का इलाज जब संभव है तो उसे किया जाना चाहिए। यह भी हैरानी की बात है कि केंद्रीय गृह मंत्री से मुलाकात तथा उनके द्वारा की गई सिफारिश से भी इलाज अभी तक नहीं हुआ है।

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